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श्रीमद् भगवद् गीता के चौथे अध्याय के पहले श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुमसे पहले मैंने कर्म योग का ये दिव्य ज्ञान सूर्य को दिया था। सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को बताया था। इस तरह ये ज्ञान ऋषियों तक पहुंचा। लेकिन, बहुत समय बीत जाने की वजह से मनुष्य लोक में ये ज्ञान लुप्त हो गया है।
तू मेरा भक्त है और सखा है, इसीलिए मैं ये ज्ञान तुझे फिर से दे रहा हूं। श्रीकृष्ण की ये बातें सुनकर अर्जुन ने पूछा कि आपका जन्म तो अभी हुआ है। सूर्यदेव का जन्म तो बहुत पहले हो चुका है। तो ये बात मैं समझ नहीं पा रहा हूं, आपने सूर्य देव को ये ज्ञान कैसे दिया?
अर्जुन का प्रश्न सुनकर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। मैं उन सभी जन्मों के बारे जानता हूं, लेकिन तू नहीं जानता। मैं अजन्मा हूं, अविनाशी हूं। जब-जब धरती पर धर्म घटता है और अधर्म बढ़ता है तो मैं अपनी योगमाया से प्रकट होता हूं। मैं मेरे भक्तों की, संतों की रक्षा के लिए और पापियों का अंत करने के लिए अवतार लेता हूं।
जो भक्त मेरे रहस्यों को समझ लेता है, उसे मेरी कृपा मिल जाती है और फिर उसकी आत्मा फिर से जन्म नहीं लेती है। जो लोग भय और क्रोध जैसी बुराइयों से दूर रहते हैं, उन पर मेरी विशेष कृपा रहती है। जो भक्त जिस तरह मेरी कृपा चाहता है, मैं उसी तरह उन पर कृपा करता हूं। क्योंकि, सभी मनुष्य मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
मनुष्य लोक में कर्म ही प्रधान है। जो लोग कर्म करते रहते हैं, अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटते हैं, उन्हें ही सिद्धि यानी सफलता मिलती है। इसीलिए हर व्यक्ति को अपने कर्म करते रहना चाहिए। कर्मों के प्रभाव से मनुष्य का कल्याण हो सकता है।
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